Saturday, May 8, 2021

एक कविता "कहते थे कुल्लू बाबू"

 कहते थे कुल्लू बाबू


सोचो अगर ना हुई रोशनी, कैसे होगा उजियारा।

बिजली अगर नहीं होगी, कैसे चमकेगा जग सारा।।


कैसे चलेगी आटा चक्की, कैसे रोटी खाओगे।

नहीं चेलगा पम्प अगर, कैसे तुम पानी पाओगे।।


बिन बिजल दिन सूना होगा, सूनी होगी काली रात।

हुआ नहीं यदि चार्ज कहीँ तो, कैसे होगी फोन से बात।।


बन्द पड़े होंगे कारखाने, हम किस ऑफिस जाएँगे।

काम नहीं होगा कुछ भी तो, कैसे खर्च चलाएंगे।।


दिन में बल्ब जला यदि हमने, व्यर्थ में बिजली खर्च किया।

गाँव नगर होगा अंधियारा, गर आदत ना छोड़ दिया।।


ऊर्जा संरक्षण न करके,  काट रहे हम सीढ़ी को।

यूँ ही व्यर्थ गवांया तो, क्या देंगे अगली पीढ़ी को।।


बिन बिजली जग सूना है, इस सत्य बात को मान लो तुम।

बिजली नहीं गवाएँगे यह, अपने मन में ठान लो तुम।।


हर दिन हो ऊर्जा संरक्षण, जो दिल की मैं सुन लूँ बाबू।

ऊर्जा से ही जीवन है, कहते थे कुल्लू बाबू।।



कुल्लू बाबू को समर्पित

💐



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